शहर से दूर जो टूटी हुई तामीरें हैं
अपनी रुदाद सुनाती हुई तसवीरें हैं
मेरे अशआर को अशआर समझने वालो
यह मेरे खून से लिख्खी हुई तहरीरें हैं
जाने कब तेज़ हवा किस को उड़ा लेजाये
हम सभी फर्श पे बिखरी हुई तस्वीरें हैं
ज़हन आज़ाद है हर क़ैद से अब भी मेरा
लाख कहने को मेरे पाँव में ज़न्जीरें हैं
ज़िन्दगी हम को वहां लाई है अहमर के जहाँ
जुर्म ही जुर्म है ताज़ीरें ही ताज़ीरें हैं
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